अनजान घर
- Hashtag Kalakar
- Dec 1
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By Akanksha Mishra
इस घर की देहलीज़ पर चांद नहीं आता,
ना कमरे की खिड़की पर दस्तक देता है,
ना रोशनदान से चोरी छुपे झाँक कर ठिठोली करता है,
और ना देर रात मेरे सवाल सुनता है।
सूरज भी घर की छत और दीवारें फांद कर चुप चाप ही ढल जता है,
कुछ रोज़ पहले तक हर दीवार या पर्दे को तोड़ कर घर में घुस आता था,
अब बस दूर से ही देखता है या खिड़की तक आके लौट जाता है।
तितलियां भी यहां अपना रंग नहीं बिखेरतीं,
हां,
दादुर की टर टर से बरसात की रात का पता ज़रूर चलता है,
लेकिन सांझ की लाली में,
बादल यहाँ इंद्रधनुष का जादू नहीं दिखता।
घर की हर एक चिड़िया की आवाज़ पहचानती थी मैं,
यहां चिड़ियों के सुर भी कुछ कम सुनायी पड़ते हैं,
खिड़की से आम का बाग ज़रूर दिखता है,
लेकिन उसकी टहनीयों पर तोते खेलने नहीं आते।
लोगों से भी कुछ जान पहचान ज़रूर हो गई है,
पर ये शहर,
अब भी अंजान है..
By Akanksha Mishra

👌
Very poetic
Love the flow.