अकेलापन
- Hashtag Kalakar
- Nov 28
- 2 min read
By Kristy Saikia
(It is a poem about ‘loneliness’. The way it feeds on us, clings to us all the time. It approaches us at the most unexpected moments)
दाएं और बाएं
दोनों तरफ मेरे पास
बैठें लोगों के खिलखिलाती हसी,
पता नहीं मेरे अंदर के
किसी काले अंधेरे सुरंग में
गूंजकर खामोश हो गई।
हंसी की आवाज़
सुरंग के दरवाज़े से
बार बार टकराकर,
इतनी धीमी सी हो गई
जैसे मानो किसी चाहने वाले का
इस दुनिया के दरवाज़े को
चुप चाप बंध करके चले जाना।
सुरंग के पास आकर नाम पढ़ा,
तो बड़े अक्षरों में 'अकेलापन' लिखा हुआ था।
सुरंग के अंदर चलते चलते यह
महसूस किया कि हम कितने अकेले हैं ना?
मणिकर्णिका घाट में जल रही, गल रही,
वह चिता भी अकेली हैं,
और उसको देखने वाले पर्यटक भी।
आत्म शरीर के इस अद्भुत मिलन के धागों में खुद इतने
उलझ जाते है कि
बस आईने में दिखा प्रतिबिंब ही
खुद को मानते हैं।
सुरंग में चलते समय,
मैने खुद को एक गिद्ध के रूप
में देखा।
खून से लथपथ, सोंच से मैं
किसी के मांस को चीरकर खा रही था।
हिम्मत करने आगे बढ़ी,
तो खुद के नापसंद अतीत के
यादों को देखा।
या तो फिर मैं कभी खुद को
एक दीमक के रूप में
देखती थी।
जो आहिस्ते आहिस्ते खुद के ही
कल को चबा कर निगल रही थी।
इस अकेलेपन के भी कई रूप है
इसका शिकार भी हम हैं,
और इसका घर भी।
परछाई का साथ बस रोशनी तक हैं।
इंसानों का साथ बस प्यार की मौजूदगी के अहसास तक है।
साथ हैं तो हमारे अंदर पल रहा उस ‘मैं’ का,
जो आज भी उस इंसान के इंतजार में हैं,
जो अकेलेपन के सुरंग में घुसा तो पर भटका नहीं।
By Kristy Saikia

So beautiful ❤️
Marvelous poem!
true...
Niceee
Your writing has so much clarity and emotion.